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Monday, 31 December 2018

important daily, ओशो प्रवचन ( Osho Discourse)

   
                                     DAILY INDIA NEWS, ओशो प्रवचन ( Osho Discourse) 



DAILY INDIA NEWS, ओशो प्रवचन ( Osho Discourse) and other
important daily, ओशो प्रवचन ( Osho Discourse) 

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ईश्वर मौजूद है अस्तित्व की तरह, वृक्षों से मिल जाए, चांद-तारों से मिल जाए,झरनों से मिल जाए और पशु-पक्षियों से मिल जाएगा लेकिन शास्त्रों से नहीं मिलेगा।

             परमात्मा छिपा है अपनी प्रकृति में, ये प्रकृति उसका घूंघट है इस घूघंट का उठाओ। ये चांद तारें जो झिलमिल हो रहे है उसके घूंघट पे जड़े है , जरा घूंघट उठाओ और मिल जाए मगर तुम सोचते हो कि शब्दों के उहापोल में पड़े एक दिन परमात्मा को पा लोगे तो तुम असंभव चेष्टा कर रहे हो, बहुत पछताओगे।
फल सभी को बहस के अन्दर खुदा मिलता नहीं, डोर को सुलझा रहा है और सिरा मिलता नहीं। मारीफत खाने की आनन्द में बहुत दुस्वार है, शहर-ए-तन में बल्कि खुद अपना पता मिलता नहीं, किसलिए दिल की ईलाही बहरे बस्ती ना हो खैर ना खुदा मिलते है पर बा खुदा मिलता नहीं, जिन्दगानी का मजा मिलता था जिनकी बसंद में
उनकी कब्रों का दिया मुझको दिया पता मिलता नहीं । शर्फ जाहिर हो गया , शरमाए जे ओ शफा क्या ताज्जुब है जो बातिन बा सफा मिलता नहीं, पुख्ता तबो परहबादिश का नहीं होता असर, कोह सारो में निशाने नक्शपा मिलता नहीं शेंक्साहब बिरह मन से लाख बरते दोस्ती वे भजन गाए तो मंदिर से टका मिलता नहीं, फल सभी को बहस के अन्दर खुदा मिलता नहीं, डोर को सुलझा रहे और सिरा मिलता नहीं।


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                              दर्शन शास्त्र गुथियां बनाने का शास्त्र है , सुलझाने का नहीं, सुलझाने का शास्त्र योग है उसकी विधि विचार नहीं ,ध्यान है, सुलझाने की यात्रा धर्म है और उसकी विधि में कोई
सन्देह नहीं है श्रद्धा है और पाना हो ईश्वर को तो एक अपुर्व घटना के लिए तैयार होना पड़ता है, मिटने के लिए तैयार होना पड़ता है।

               ईश्वर मिलता नहीं बिना मिटे, अहंकार जब तक ना जाए ईश्वर नहीं मिलता और दर्शन शास्त्रों में अहंकार परिपुष्ट होता है, पांडित्य अहंकार पर खुब आभूषित की तरह हो जाती है।
त्यागी तथाकथित त्यागी जिस तरह सुक्ष्म अहंकार की धार रख लेता है उस तरह की धार किसी के अहंकार में न मिलेगी, औरों के अहंकार बोथले है त्यागियों और पंडितों के अहंकार बड़े धार वाले है और मिटने से मिलता है खुदा । खुदी मिटती है तो मिलता है खुदा, हंगामा है क्यों बरफा थोड़ी सी जो पीली, डाका तो नहीं मारा , चोरी तो नहीं की, ना तर्जुबाकारी से वाइस की ये बातें है इस रंग को क्या जाने और पुछुं तो कभी पी है। उस मैं से नहीं मतलब, दिल जिस से है बेगाना, मकसुद है इस मैं से दिल ही मे जो खिंचती है इस शोक वही में पी, होश जरा सो जा, मेहमाने न जरा इस्तम, एबर्ग तजल्ली है, वहां दिल में की सदमें दो या जी में की सब सह लो, उनका भी अजब दिल मेरा भी अजब दिल है।


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                                                  हर जर्रा चमकता है अनुवार-ए ईलाही से और हर सांस यह कहती हम है तो खुदा भी है, सुरज में लगे धब्बा फितरत का है करिश्मा, बुद्धम को कहे काफिर अल्लाह कि मर्जी है।
पीने से मिलता है खुदा, ऐसा मधु पीना है जो अंगुरों से नहीं आत्माओं से निकलता है, ये पीना तो अपने भीतर ही घटता है, ना तर्जुबाकारी से वाईस की ये बाते। ये जो उपदेशक है इन्हें कुछ अनुभव नहीं इसलिए इस तरह की बातें कर रहें है इस रंग को क्या जाने पुछो तो कभी पी नहीं। ये तो पियक्कड़ों का रंग है। ये तो जो पी लेते है और पीने की जो चुकानी पड़ती है और पीने की शर्त है अपने को मिटाना, ये मैं ऐसी नहीं की सस्ती मिल जाए। ये मधुशाला ऐसी नहीं की मुफ्त में प्रवेश हो जाए, गवांना पड़ता है अपने को और जो अपने को मिटाते है वो प्रवेश पाते है।

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                         उस मैं से नहीं है मतलब दिल जिस से हैं बेगाना, मकसुद है इस मैं से दिल ही न जो किश्ती । एक तो शराब है जो तुम बार से पी लेते हो और वो जाकर भीतर तुम्हारे जिगर को नष्ट करती है और एक शराब ऐसी भी है जो तुम्हारे जिगर में बनती और बाहर निकल कर तुम्हारे आभा में बिखरती है और तुम्हारे बाहर एक सौंदर्य का निखार हो जाता है और तुम्हारे बाहर एक सौंदर्य का निखार हो जाता है वहां एक प्रशांत का जन्म हो जाता है। तुम मिटा की तुम पाओगे, परमात्मा कोई और नहीं तुम्हारे भीतर छिपा तुम्हारा ही राज़ है, शास्त्रों में ना खोजो , शास्त्रों में खोजना और मधुशालाओं में खोजना । लेकिन जिगर की गहराईयां और उसी की गलियां में खोजो और अपने भीतर उतरो। वहीं इस अन्तर के कुएं में डूबकी मारो, वहीं अमृत के स्त्रोत उपलब्ध
होगें। वहीं हुए है जब भी कभी उपलब्ध हुए है।

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