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Thursday, 3 January 2019

important daily current bollywood news, कादरखान की केवल दो मिनटों में पढ़े पूरी जीवनी-


                                                   important daily india news


ये भारतीय सिनेमा कादर खान साहब का ऋणी रहेगा, केवल दो मिनटों में पढ़े पूरी जीवनी-


DAILY INDIA NEWS, BOLLYWOOD  कादरखान की केवल दो मिनटों में पढ़े पूरी जीवनी-
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हिन्दी सिनेमा के मशहुर अभिनेता श्री कादर खान का केनडा के एक अस्पताल में निधन हो गया।
यह पुष्टि उनके बेटे सरफराजखान ने की थी।
81 साल के कादर खान एक दिग्गज अभिनेता होने के साथ-साथ डॉयलॉग और पटकथा लेखक भी थे तथा उनकी सेहत कुछ दिनों चर्चा में थी। सोशल मिडिया पर उनकी मौत पर अफवाहें कईं बार भी उड़ी, अभिनेता अमिताभ बच्चन और अभिनेत्री रवीना टंडन ने सबसे पहले ट्वीट कर उनके बेहतर स्वास्थ्य
की प्रार्थना की। 80 और 90 के दशक में कादरखान गोविंदा और अनिल कपुर के साथ कई बार दिखने वाले अभिनेता रहे।

DAILY INDIA NEWS, BOLLYWOOD  कादरखान की केवल दो मिनटों में पढ़े पूरी जीवनी-
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                           1973 में राजेश खन्ना की फिल्म दास से बोलीवुड में कदम रखने वाले कादरखान ने 300 से ज्यादा फिल्मों में काम किया। वो रात का वक्त होता, बोम्बे में घर के पास एक यहुदी कब्रिस्तान में हर ओर अंधेरा और सन्नाटा और एक बच्चा वहां बैठकर संवाद अदायगी का रियाज़ करता रहता। एक रात यूंही रियाज़ जारी थी कि एक टॉर्च लाइट की रोशनी हुई और किसी ने पूछा कि कब्रिस्तान में क्या कर रहे हो।
तो बच्चा बोला कि मैं दिन में जो भी अच्छा पढ़ता हुं वो रात में यहां आकर बोलता हुं और रियाज करता हूं।
अशरफखान नाम के वो सज्जन फिल्मों में काम करते थे। उन्होंने पूछा की नाटक में काम करोगे, वो बच्चा था कादरखान और वहां से शुरू हुआ वो सफर जो दशकों तक रफ्तार के साथ ऊंचाईयों की चरम सीमाओं तक जारी और सराहनीय रहा।

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                             जब कादर खान ने 1977 में मुकद्दर का सिकन्दर लिखी तो इसमें एक अहम सीन है जो बचपन में अमिताभ बच्चन कब्रिस्तान में मां के मरने पर रो रहा है और वहां से गुज़र रहा एक फकिर जो कि कादर खान थे जो बच्चे से कहता है कि इस फकिर की एक बात याद रखना ज़िंदगी का सही लुफ्त उठाना है तो मौत से खेलो, सुख तो बेवफा है चंद दिनों के लिए आत है और वो चला जाता है और दुःख तो अपना साथी है अपने साथ रहता है, पौंछ दे आंसू और दुख को अपना ले तकदीर तेरे कदमों में होगी और तु मुकद्दर का बादशाह होगा।

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                                  और हां ये सीन कादरखान ने अपने घर के पास वाले उसी कब्रिस्तान से लिया था।
कादरखान ने 70 के दशक से डायलॉग लिखने से लेकर एक्टिंग तक भारतीय सिनेमा में खुब नाम कमाया।
 खुन-पसीना, लावारिस, परवरिश, अमर-अकबर-एनथनी, नसीब और कुली, इन फिल्मों में पटकथा या डायलॉग लिखने वाले कादरखान ने अमिताभ बच्चन के करियर को सवारने में अहम रोल निभाया। हालांकि उनकी शुरूआती ज़िंदगी काफि संघर्ष भरी रही और कईं इंटरव्यु में कादरखान बता चुके है
कि अफगानिस्तान में उनके जन्म से पहले उनके तीन भाइयों की मौत हो चुकी थी जिसके बाद उनके माता-पिता ने अफगानिस्तान छोड़ भारत आने का फैसला किया जल्द ही मां-बाप का तलाक हो गया और सौतेले पिता के साथ बचपन बहुत गरीबी में निकला, बावजुद उन्होंने सिवील इंजिनीयरिंग का डिप्लोमा भी किया और वो मुंबई के कॉलेज में बच्चों का पढ़ाने लगे। कॉलेज में एक बार नाटक प्रतियोगिता थी जहां नरेन्द्र बेदी और कामिनी कौशल जज़ थे। कादरखान को उसमें बेस्ट एक्टर और लेखक का इनाम मिला ।

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 इसके साथ ही एक फिल्म में भी एक संवाद लिखने का मौका मिला और पगार थी 1500 रुपये और वो फिल्म थी 1972 में आयी जवानी दीवानी जो हिट हो गई। रफ्फु चक्कर जैसी फिल्में उन्हें मिलने लगी।
कादरखान की ज़िंदगी में बड़ा मौड़ तब आया जब 1974 में मनमोहन सरदेसाई और राजेश खन्ना के साथ रोटी में काम करने का मौका मिला। मनमोहन देसाई को कादरखान पर खासा भरोसा नहीं था इसी सम्बंध में मनमोहन दैसाई कहते की तुम लोग साही तो ऐसी कर लेते हो पर मुझे चाहिए ऐसे  डायलॉग जिनपर जनता की तालियां बजे।

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                       फिर क्या था, कादर खान एक संवाद लिखकर लाए और मनमोहन देसाई को वो संवाद इतना पसंद आया कि वो अपने घर के अंदर गये और अपना तौसबा टीवी, 21000 रुपये और ब्रेसलेट कादर खान को तौहफे में दे दिये और पहली बार कादरखान को डायलॉग लिखने के लिए एक लाख से ज्यादा फिस मिली।
यही से शुरू हुआ मनमोहन देसाई, प्रकाश मेहरा और अमिताभ बच्चन के साथ उनका शानदार सफर तथा कादर खान कि लिखी फिल्में और डायलॉग एक के बाद एक हिट होने लगे।
अग्निपथ, सत्ते पे सत्ता और शराबी में भी अमिताभ के लिए संवाद कादरखान ने ही दिए और साथ ही शुरू होता है कादरखान की एक्टिंग का सफर ।



1973 में फिल्म द़ाग में वो एक मामूली वकील के रोल में कादरखान दिखाई दिये तो वही 1977 में पुलिस इंस्पेक्टर के छोटे से रोल में अमिताभ बच्चन साथ दिखाई दिए। इसके बाद तो खुन-पसीना, नसीब, कुर्बानी नसीब आदि फिल्मों की मानो झड़ी ही लग गई। तथा विलन के रूप में लोग कादर खान को पहचानने लगे। कादरखान की एक ओर खूबी थी कि वो लीप रिडिंग कर सकते थे और मतलब वो दूर से ही बोलते लबों के शब्दों को समझ लेते थे।

अपने इंटरव्यू में ये किस्सा चलाना वो कभी नहीं भूलते। शुरू-शुरू में जब वो मनमोहन देसाई के घर गए तो उन्होंने दूर से ही ये कहा कि उल्लू के पट्ठे को समझ में नहीं आया, फिर से आ गया। तभी कादरखान ने पास जाकर कहा कि आपने मेरे बारे में ये लब्ज बोले हैं, मैं लिप रिडिंग कर सकता हूं और बाद में फिल्म नसीब में उन्होंने ये सीन इस्तेमाल किया है जब हिरोइन लिपरिडिंग से विलन की बातें समझती है। अमिताभ के करियर में कादरखान की अहम भूमिका रही है। एक समय कादरखान और अमिताभ के बीच में गहरी दोस्ती थी और एक इंटरव्यू में कादरखान में अमिताभ के बारे में कहा था कि मैं अमिताभ बच्चन को लेकर एक फिल्म भी बनाना चाहता था और उस फिल्म का नाम था जाहिल। फिर बच्चन साहब को कूली फिल्म की सुटिंग में चोट लग गई, फिर वो राजनिती में चले गए तथा बाद में फिल्म कभी नहीं बन पाई।

और फिर हमारे बीच में दरार आ गई। 1983 में कादरखान ने फिल्म हिम्मतवाला लिखी और तथा अपने लिए कॉमेडी वाला रोल भी लिखा अब तक वो विलन वाले रोल से बाहर आना चाहते थे।
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